Hindi Sahitya Ka Itihas और उसका विभाजन | डाउनलोड करें PDF Notes

0 734

आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे हैं Hindi Sahitya Ka Itihas और उसके विभाजन के बारे में। हिन्दी साहित्य का इतिहास अलग-अलग लेखकों के द्वारा लिखा गया जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ. नागेन्द्र (Dr. Nagendra) प्रमुख हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (Ramchandra Shukla) द्वारा लिखित, हिन्दी साहित्य का इतिहास को सबसे प्रामाणिक तथा व्यवस्थित इतिहास माना गया है।

Content: Hindi Sahitya ka Itihas

Hindi Sahitya Ka Itihas और उसका विभाजन

हिंदी, भारत के अलावा विश्व में भी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिंदी की जड़ें प्राचीन भारत में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा संस्कृत तक जाती हैं लेकिन मध्ययुगीन भारत के अवधी, मागधी, अर्धमागधी और मारवाड़ी जैसी भाषाओं के साहित्य को हिन्दी का आरम्भिक साहित्य माना जाता है। Hindi Sahitya की शुरुआत लोकभाषा कविता के माध्यम से हुई और गद्य का विकास इसके बहुत बाद में हुआ।

हिंदी साहित्य का आरंभ अपभ्रंश में मिलता है। हिंदी में तीन प्रकार के साहित्य मिलते हैं – गद्य, पद्य और चम्पू। गद्य और पद्य दोनों के मिश्रण को चंपू कहते है। खड़ी बोली की पहली रचना कौन सी थी इस पर तो विवाद है लेकिन अधिकतर साहित्यकार हिन्दी की पहली प्रामाणिक गद्य रचना लाला श्रीनिवासदास द्वारा लिखे उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ को मानते हैं।

Hindi Sahitya का आरंभ

हिंदी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। यह, वह समय था जब सम्राट हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे-छोटे शासन केंद्र स्थापित हो गए थे जो संघर्षरत रहा करते थे।

हिंदी साहित्य में कितने काल होते हैं?

हिन्दी साहित्य के विकास को पाँच चरणों में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित है:

  • आदिकाल (1400 ईस्वी पूर्व)
  • भक्ति काल (1375 से 1700)
  • रीति काल (संवत 1700 से 1900)
  • आधुनिक काल (1850 ईस्वी के पश्चात)
  • नव्योत्तर काल (1980 ईस्वी के पश्चात)

1. आदिकाल (1400 ईस्वी पूर्व)

1400 ईसवी से पूर्व का काल हिन्दी साहित्य का आदिकाल माना जाता है जब हिन्दी का उद्भव हो रहा था। दिल्ली, कन्नौज, अजमेर में हिन्दी की विकास-यात्रा मानी जाती है। उस समय दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान का शासन था और उनका एक दरबारी कवि हुआ करता था जिसका नाम चंदबरदाई था। ‘पृथ्वीराजरासो’ चंदबरदाई की रचना है जिसमें पृथ्वीराज की जीवन गाथा लिखी है और उसे ही हिंदी साहित्य की सबसे बृहत् रचना मानी जाती है।

2. भक्ति काल (1375 से 1700)

हिन्दी साहित्य का भक्ति काल 1375 से लेकर 1700 तक माना जाता है। ये काल मुख्य रुप से भक्ति भावना को दिखाता है। इस काल को दो काव्य-धाराओं ने समृद्ध बनाया – निर्गुण भक्तिधारा और सगुण भक्तिधारा।

निर्गुण भक्तिधारा के दो हिस्से हैं। पहला संत काव्य जिसे ज्ञानाश्रयी शाखा भी कहते हैं। इसके प्रमुख कवि कबीरदास, नानक, मलूकदास, दादूदयाल, रैदास, सुन्दरदास आदि हैं। वहीं इसका दूसरा हिस्सा सूफी काव्य जिसे प्रेमाश्रयी शाखा भी कहते हैं। इस शाखा के प्रमुख कवि- मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन, नूर मोहम्मद, मंझन, शेख नबी, कासिम शाह आदि हैं।

भक्तिकाल की दूसरी धारा जो सगुण भक्ति है उसे दो शाखाओं में बांटा गया है- रामाश्रयी शाखा और कृष्णाश्रयी शाखा। रामाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि- तुलसीदास, केशवदास, हृदयराम, प्राणचंद चौहान, अग्रदास, नाभादास, महाराज विश्वनाथ सिंह, रघुनाथ सिंह हैं। वहीं इसके कृष्णाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि – सूरदास, रहीम नंददास, कुम्भनदास, चतुर्भुज दास, कृष्णदास, मीरा, रसखान, छीतस्वामी, गोविन्द स्वामी आदि हैं ।

3. रीति काल (संवत 1700 से 1900)

Hindi Sahitya Ka Itihas में तीसरा काल है रीति काल। ये काल संवत 1700 से 1900 तक माना जाता है यानी 1643 ई० से 1843 ई० तक। रीति का  मतलब होता है बना बनाया रास्ता। तो इस काल को रीतिकाल इसलिए कहा गया क्योंकि इस काल में ज्यादातर कवियों ने श्रृंगार वर्णन, अलंकार प्रयोग, छंद बद्धता आदि के बंधे रास्ते की ही कविता की थी। हालांकि कुछ रीति-मुक्त कवियों ने अपनी रचना के विषय मुक्त रखे थे। इस काल को तीन भागों में बांटा गया है- रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त। इस युग के प्रमुख रचनाकार केशव, घनानन्द , बिहारी, भूषण, मतिराम आदि रहे।

4. आधुनिक काल (1850 ईस्वी के पश्चात)

Hindi Sahitya Ka Itihas का आधुनिक काल, पिछली दो सदियों में विकास के अनेक पड़ावों से गुज़रा है। जिसमें गद्य और पद्य में अलग-अलग विचार धाराओं का विकास हुआ। एक ओर इसे काव्य में चार नामों छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग से जाना गया, तो वहीं गद्य में इसे भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, रामचंद‍ शुक्ल, प्रेमचंद युग एवं अद्यतन युग का नाम दिया गया।

अद्यतन युग के गद्य साहित्य में ऐसी कई साहित्यिक विधाओं का विकास हुआ जो पहले या थीं नहीं या इतनी विकसित नहीं थीं कि उनको अलग विधा का नाम दिया जाए, जैसे कि आत्मकथा, डायरी, या‌त्रा विवरण, पटकथा लेखन, रेडियो नाटक, फ़िल्म आलेख आदि।

5. नव्योत्तर काल (1980 ईस्वी के पश्चात)

इस काल का साहित्य भारत के समकालीन पुनर्जागरण और पूरे विश्व में भारतीयों की सफलता से प्रेरित हुआ है। इस काल में गद्य-निबंध, कहानी, समालोचना, तुलनात्मक आलोचना, नाटक-उपन्यास, साहित्य आदि जिनका समुचित विकास हो रहा है।

नव्योत्तर काल की कई धाराएं हैं जैसे – पश्चिम की नकल को छोड़ एक अपनी वाणी पाना, अतिशय अलंकार से परे सरलता पाना, जीवन और समाज के प्रश्नों पर असंदिग्ध विमर्श।

इस युग के प्रमुख साहित्यकार

  • समालोचक
  • कहानी लेखक
  • उपन्यासकार
  • नाटककार
  • निबंध लेखक

साहित्य का अर्थ

किसी विषय, कवि या लेखक से संबंधित सभी ग्रंथों और लेखों आदि के समूह को साहित्य कहते हैं। साहित्य शब्द का विग्रह दो तरह से किया जा सकता है। सहित = स+हित = सहभाव, यानि हित का साथ होना ही साहित्य है। साहित्य शब्द अंग्रेजी के Literature का और संस्कृत में ‘वाङ्मय’ का पर्यायी है या फिर यूं कह लें साहित्य किसी भाषा या लोगों की संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।

हिंदी साहित्य का पहला इतिहासकार

गार्सा-द-तासी के ग्रन्थ इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐन्दूई ऐन्दूस्तानी था और उनको Hindi Sahitya का पहला इतिहासकार माना जाता है।

हिन्दी साहित्य का इतिहास के मुख्य इतिहासकार और उनके ग्रन्थ

  1. गार्सा द तासी- इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी

2. शिवसिंह सेंगर- शिव सिंह सरोज

3. जार्ज ग्रियर्सन- द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिंदोस्तान

4. मिश्र बंधु- मिश्र बंधु विनोद

5. रामचंद्र शुक्ल- हिन्दी साहित्य का इतिहास (Hindi Sahitya ka Itihas)

6. हजारी प्रसाद द्विवेदी- हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, हिन्दी साहित्य – उद्भव और विकास

7. रामकुमार वर्मा- हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास

8. डॉ धीरेन्द्र वर्मा – हिन्दी साहित्य

9. डॉ नगेन्द्र- हिन्दी साहित्य का इतिहास, हिन्दी वाङ्मय 20वीं शती

10. रामस्वरूप चतुर्वेदी – हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास

11. बच्चन सिंह – हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास

14. डा. भोला नाथ तिवारी-हिंदी साहित्य       

15. विश्वनाथप्रसाद मिश्र-हिंदी साहित्य का अतीत        

16. परशुराम चतुर्वेदी- उत्तरी भारत की संत परम्परा    

17. प्रभुदयाल मीतल- चैतन्य सम्प्रदाय और उसका साहित्य      

18. डा. नलिन विलोचन शर्मा – हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन 

19. डा. मोतीलाल मेंनारिया- राजस्थानी पिंगल साहित्य, राजस्थानी भाषा और साहित्य        

20. कृपाशंकर शुक्ल – आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास     

21. पं. राम नरेश त्रिपाठी – कविता कौमुदी (दो भाग )  

22. सूर्यकान्त शास्त्री – हिंदी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास

23. पं. महेश दत्त शुक्ल – हिंदी काव्य संग्रह   

24. डा. टीकम सिंह तोमर – हिंदी वीर काव्य 

25. आचार्य चतुरसेन – हिंदी साहित्य का इतिहास       

26. डा. रामस्वरुप चतुर्वेदी – हिन्दी साहित्य और संवेदना का इतिहास    

27. डा. भगीरथ मिश्र – हिंदी काव्य शास्त्र का इतिहास 

28. डा. रामखेलावन पाण्डेय – हिंदी साहित्य का नया इतिहास   

29. डा. विजयेन्द्र स्नातक राधावल्लभ सम्प्रदाय – सिद्धान्त और साहित्य

30. पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी – हिंदी साहित्य विमर्श

31. आयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हिंदी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास        

32. डा. विश्वनाथ त्रिपाठी – हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास   

33. नागरी प्रचारिणी सभा, काशी हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास १९५७ से १९८४ तक

34. सुमन राजे – हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास

साहित्य का उद्देश्य

साहित्य के उद्देश्य के विषय में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं । भारतीय साहित्यकार भी रस की अनुभूति के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम विचक्षणता और कीर्ति की प्राप्ति भी साहित्य के उद्देश्य मानते है। आचार्य मम्मट के विचारानुसार, “यश की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, उचित व शिष्ट व्यवहार का ज्ञान अकल्याण को दूर करने में सहायक, सरलता और लौकिक आनन्द की प्राप्ति काव्य के प्रयोजन है।

मुंशी प्रेमचंद्र के अनुसार साहित्य का उद्देश्य

साहित्य केवल मन बहलाव की चीज नहीं है। उसका मनोरंजन के अलावा और भी कुछ उद्देश्य है। अब वह केवल नायक-नायिकाओं के संयोग-वियोग की कहानी नहीं बताता बल्कि जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है और उनको हल भी करता है।

मुंशी प्रेमचंद्र के अनुसार साहित्यकार अन्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा संवेदनशील होता है उसके अंदर समाज एवं सौंदर्यबोध की वृति जितनी जागृत और सक्रिय होगी वह उतने ही अनुपात में प्रभावशाली साहित्य की रचना कर सकता है।

मुंशी प्रेमचंद्र के अनुसार साहित्यकार अभद्रता, असुंदरता, अन्याय से लड़ता है और अपने साहित्य के माध्यम से उसका पर्दाफाश करता है।

Hindi Sahitya Ka Itihas Ramchandra Shukla

Hindi Sahitya ka Itihas पुस्तक जो हिंदी साहित्य के इतिहास पर लिखी गयी आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा, उसे अब तक सबसे प्रमाणिक और व्यवस्थित माना गया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिन्दी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा था जिसे बाद में स्वतंत्र पुस्तक के रूप में 1929 ई० में प्रकाशित आंतरित कराया गया। जिसमें उन्होंने गहन शोध और चिन्तन के बाद हिन्दी साहित्य के पूरे इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस पुस्तक में करीब 1000 कवियों के जीवन चरित्र का विवेचन किया गया है। कवियों की संख्या की अपेक्षा उनके साहित्यिक मूल्यांकन को महत्त्व दिया गया है अर्थात हिन्दी साहित्य के विकास में विशेष योगदान देने वाले कवियों को ही इसमें शामिल किया गया है। कवियों एवं लेखकों की रचना शैली का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। इसमें प्रत्येक काल या शाखा की सामान्य प्रवृत्तियों का वर्णन कर लेने के बाद उससे संबद्ध प्रमुख कवियों का वर्णन किया गया है।

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की प्रमुख समस्याएं

हिंदी साहित्य के प्रारम्भ का प्रश्न, हिंदी साहित्य के लेखन की पहली समस्या यह है कि इसका प्रारम्भ कब से माना जाए। शिवसिंह सेंगर, जार्ज ग्रियर्सन और मिश्र बंधुओं ने हिंदी साहित्य का प्रारम्भ सातवीं शती से स्वीकार किया है। राहुल सांस्कृत्यायन ने सातवीं शती के सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि माना है।

वहीं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसका आरम्भ दसवीं शताब्दी माना है लेकिन शुक्ल ने जिन कृतियों के आधार पर अपने मत का निर्धारण किया था उनका अस्तित्व भी संदेह की नजर में आ गया है। कुछ विद्वानों ने बारहवीं शती से हिंदी का आरम्भ माना है। इसमें डॉ. गणपति चन्द्र का उल्लेख किया जा सकता है।

डॉ. उदयनारायण तिवारी, डॉ. नामवरसिंह आदि विद्वानों ने हिंदी साहित्य एवं भाषा का आरंभ चैदहवीं शती से माना है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी साहित्य के प्रारम्भ के संबंधों में कई मत प्रचलित हैं। लेकिन 12 वीं शती को विद्वानों ने तर्कसंगत एवं प्रामाणिक माना है।

काल विभाजन की समस्या

हिंदी साहित्य को आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा आधुनिक काल में विभाजित किया गया है। आचार्य शुक्ल ने अपने Hindi Sahitya ka Itihas में इसी विभाजन को अपनाया है। लेकिन बाद में यह काल विभाजन भी विद्वानों के संदेहों के घेरे में आ गया। साहित्य की लगातार विकासशील प्रकृति के कारण किसी भी काल को अन्तिम सत्य के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता है।

नामकरण की समस्या

Hindi Sahitya ka itihas के लेखन में काल-विभाजन के साथ ही नामकरण की समस्या भी जुड़ी हुई है। इसके लिए कभी प्रमुख साहित्यिक प्रवृत्ति को आधार बनाया जाता है और कभी साहित्यकार को। कभी पद्धति का आश्रय लिया जाता है और कभी विषय का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिन ग्रन्थों के आधार पर आदिकाल को वीरगाथाकाल कहना उपयुक्त समझा था।

उसके बाद के विचारकों ने उस पर असहमति व्यक्त की और अपने-अपने मत के समर्थन में विभिन्न प्रकार के तर्क प्रस्तुत किये। उनके अनुसार इन ग्रन्थों में से कुछ तो अपर्याप्त हैं और कुछ की प्रामाणिकता संदिग्ध है और कुछ का वीरगाथा-वर्णन से किसी प्रकार का संबंध ही नहीं है।

साहित्यकारों के चयन और निर्धारण की समस्या

Hindi Sahitya ka Itihas लेखन में साहित्यकारों के चयन और उनके निर्धारण की भी गंभीर समस्या है। लेखक के सामने  संकट रहता है कि किस रचनाकार की रचना को  अपनी कृति में स्थान दे और किस को नहीं दे। इस कारण काफी त्रुटियाँ होने की संभावना रहती हैं।

मूल्यांकन की समस्या

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में मूल्यांकन की समस्या भी एक गंभीर समस्या बनी रहती है। साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन और नामकरण से अधिक महत्त्वपूर्ण मूल्यांकन की समस्या होती है। किसी इतिहासकार की वास्तविक शक्ति रचनाओं, रचनाकारों और रचना प्रवृत्तियों के मूल्यांकन से ही प्रकाश में आ पाती है। इसके लिए आवश्यक है कि साहित्यलेखक तटस्थ एवं निष्पक्षतापूर्ण कार्य को सम्पन्न करें।

इतिहास-लेखन की पद्धति संबंधी समस्या

साहित्य के इतिहास-लेखन की पद्धति भी साहित्य-इतिहास-लेखन की एक समस्या है। हिंदी साहित्य के प्रारम्भिक इतिहास ग्रन्थों में इस प्रकार की समस्या संबंधी परिचय प्राप्त होता हैं।

हिंदी साहित्य के वैचारिक स्त्रोतों की समस्या

हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन में साहित्य के वैचारिक स्रोतों की भी एक बड़ी समस्या है। हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य का विकास बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से माना जाये लेकिन हिंदी साहित्य में पायी जाने वाली अनेक विचार धाराओं और विशेषताओं के स्रोत पौराणिक भारतीय साहित्य और संस्कृत में निकाले जा सकते हैं

जैसे आदिकालीन जैन धर्म से संबंधित रास काव्य परम्परा के स्रोत महावीर, नेमिनाथ आदि जैन तीर्थकारों के उपदेशों में समाहित हैं। वैसे ही जैसे भक्तिकालीन साहित्य में विद्यमान दार्शनिक विचारधारा और रहस्यानुभूति का मूल उद्गम स्रोत उपनिषदों में  है।

हिंदी साहित्य के इतिहास में अन्य भाषाओं का साहित्य

Hindi Sahitya ka itihas में अन्य भाषाओं के साहित्य का सन्निवेश होना चाहिए या नहीं, यह भी एक गम्भीर समस्या है। हिंदी साहित्य के विद्वानों का मानना रहा है कि उर्दू को भी हिंदी साहित्य में मिलाया जा सकता है।

हिन्दी साहित्य का नामकरण एवं विभाजन

हिन्दी साहित्य को विद्वानों ने अलग-अलग कालखण्डों में बाँटकर अनेक नामों में विभाजित किया है। डॉ. नगेन्द्र (Dr. Nagendra) ने हिन्दी साहित्य के इतिहास के नामकरण और कालखण्ड निम्न दिए हैं

  • ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार – आदिकाल,  मध्यकाल,  आधुनिककाल आदि।
  • शासनकाल के अनुसार – एलिजाबेथ युग, मराठा काल आदि।
  • लोकनायक के प्रभाव के अनुसार – चैतन्य काल, गाँधी युग।
  • साहित्यिक नेता के प्रभाव के अनुसार – रवीन्द्र-युग, भारतेंदु युग।
  • घटनाओं या आंदोलनों के आधार पर – भक्तिकाल, पुनर्जागरण काल आदि।
  • साहित्यिक विशेषताओं के आधार पर – रीतिकाल, छायावाद आदि।

इसी प्रकार विद्वानों ने अलग-अलग समय और विशेषताओं के आधार पर हिन्दी साहित्य के इतिहास का विभाजन और नामकरण किया है। कुछ इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत नामकरण नीचे दिए गए हैं

जार्ज ग्रियर्सन द्वारा अपने ग्रन्थ ‘मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिट्रेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ में हिन्दी साहित्य के इतिहास का नामकरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है:

  • चारण काल
  • 15वीं शती का धार्मिक पुनर्जागरण
  • जायसी और उनकी कविता
  • ब्रज का कृष्ण सम्प्रदाय
  • मुगल दरबार
  • तुलसीदास
  • रीतिकाल
  • तुलसीदास के अन्य परवर्ती कवि
  • अट्ठारवीं शताब्दी
  • कम्पनी के शासन में हिन्दुस्तान
  • महारानी विक्टोरिया के शासन में हिन्दुस्तान
  • विविध अज्ञात कवि
  • मिश्रबन्धुओं द्वारा अपने ग्रन्थ ‘मिश्रबन्धु विनोद’ में किया गया नामकरण निम्न है
  • आरम्भिक काल
  • पूर्वारम्भिक काल
  • उत्तरारम्भिक काल
  • माध्यमिक काल
  • पूर्व माध्यमिक काल
  • प्रौढ़ माध्यमिक काल
  • अलंकृत काल
  • पूर्वालंकृत काल
  • उत्तरालंकृत काल
  • परिवर्तन काल
  • वर्तमान काल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा प्रस्तुत नामकरण निम्न है:

  • आदिकाल (वीरगाथा काल)
  • पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)
  • उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल)
  • आधुनिक काल (गद्य काल)

बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा प्रस्तुत नामकरण निम्न है:

  • आदियुग
  • पूर्व मध्ययुग
  • उत्तर मध्ययुग
  • आधुनिक युग

डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा प्रस्तुत नामकरण निम्न है:

  • सन्धिकाल
  • चारण काल
  • भक्तिकाल
  • रीतिकाल
  • आधुनिक काल

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा प्रस्तुत नामकरण निम्न है:

  • आदिकाल
  • पूर्व मध्यकाल या भक्तिकाल
  • उत्तर मध्यकाल श्रृंगार का
  • आधुनिक काल या गद्यकाल

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रस्तुत नामकरण निम्न है:

  • आदिकाल
  • भक्तिकाल
  • रीतिकाल या प्रेममार्गी काल
  • आधुनिक काल

डॉ. हरिश्चन्द्र वर्मा का नामकरण निम्न है:

  • संक्रमण काल
  • भक्तिकाल
  • रीतिकाल
  • राष्ट्रीय जागरण काल
  • आधुनिकतावादी चेतना काल

इसी प्रकार अनेक विद्वानों ने हिन्दी साहित्य की विशेषताओं, समय और साहित्यकारों को आधार बनाकर हिन्दी साहित्य के इतिहास का नामकरण किया है।

ये भी पढ़िये IAS Full Form In Hindi

तो दोस्तों ये था Hindi Sahitya ka Itihas सम्पूर्ण विवरण जिसमें हमनें हिंदी साहित्य के आरंभ से लेकर हर महत्वपूर्ण जानकारियां आपके साथ साझा की हैं।

Source : Wikipedia

Leave A Reply

Your email address will not be published.