Nepal में बढ़ा राजतंत्र समर्थकों का आंदोलन, क्या लौटेगा राजतंत्र?

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नई दिल्ली, Nepal में हाल के दिनों में राजतंत्र की बहाली को लेकर भारी बवाल मचा हुआ है। काठमांडू, जहां राजतंत्र और प्रजातंत्र के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, हिंसा की आग में जल रहा है। इस दौरान पुलिस को स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए आंसू गैस, पानी की बौछार, और हवाई फायरिंग जैसे कदम उठाने पड़े। तो आखिर क्या है इस विवाद की जड़ और क्यों Nepal में राजतंत्र का समर्थन एक बार फिर तेज हो गया है? आइए जानते हैं।

राजतंत्र समर्थक प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई

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Nepal में शुक्रवार को राजतंत्र समर्थकों और प्रजातंत्र समर्थकों के बीच भारी टकराव हुआ। प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किया और एक घर में आग लगा दी। पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया, और स्थिति को काबू करने के लिए हवाई फायरिंग भी की। इस दौरान पुलिस के साथ झड़पों में कई लोग घायल हुए, जबकि कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार भी किया गया।

राजतंत्र समर्थक नारे लगा रहे थे जैसे “राजा आओ देश बचाओ” और “हमें राजतंत्र वापस चाहिए।” प्रदर्शनकारियों ने पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की तस्वीरों के साथ राष्ट्रीय ध्वज लहराए। इन सभी घटनाओं के बीच काठमांडू में कुछ हिस्सों में कर्फ्यू भी लगाया गया।

Nepal के राजतंत्र का इतिहास

Nepal में राजतंत्र का इतिहास काफी लंबा और विवादित रहा है। 2008 में नेपाल ने 240 साल पुराने राजतंत्र को समाप्त कर दिया था और खुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया। इसके बाद नेपाल एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना, जहां राजा की कोई राजनीतिक भूमिका नहीं रही। लेकिन, अब राजतंत्र समर्थक इसे बहाल करने की मांग कर रहे हैं।

पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की अपील के बाद से यह आंदोलन और तेज हो गया है। ज्ञानेन्द्र शाह ने लोकतंत्र दिवस (19 फरवरी) पर एक वीडियो संदेश जारी किया था, जिसमें उन्होंने राजतंत्र की बहाली के लिए समर्थन की अपील की थी। इसके बाद से देशभर में राजतंत्र समर्थकों का एक नया आंदोलन उभरकर सामने आया है।

Nepal के वर्तमान राजनीतिक माहौल में राजतंत्र का समर्थन

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राजतंत्र की बहाली की मांग Nepal की राजनीति में एक ज्वलंत मुद्दा बन गई है। नेपाल के कई बड़े राजनीतिक दल, जैसे राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और अन्य, राजतंत्र के समर्थन में हैं। दूसरी ओर, नेपाल के समाजवादी मोर्चे के नेतृत्व में हजारों लोग राजतंत्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। समाजवादी मोर्चे में नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां, जैसे सीपीएन (माओवादी केंद्र) और सीपीएन-यूनिफाइड सोशलिस्ट भी शामिल हैं।

समाजवादी समर्थक प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, जैसे “गणतंत्र प्रणाली जिंदाबाद” और “राजतंत्र मुर्दाबाद”। नेपाल में इस समय एक तरह का विभाजन देखने को मिल रहा है, जिसमें राजतंत्र समर्थक और विरोधी दोनों ही अपने-अपने पक्ष में प्रदर्शन कर रहे हैं।

यूपी सीएम योगी के पोस्टर और Nepal में भारतीय प्रभाव

राजतंत्र समर्थक रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें भी सामने आईं। योगी आदित्यनाथ के पोस्टर राजतंत्र समर्थकों के बीच दिखाए गए, जो नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के समर्थन में थे। यह दर्शाता है कि नेपाल में राजतंत्र की बहाली की मांग के पीछे न केवल स्थानीय बल्कि बाहरी प्रभाव भी काम कर रहे हैं।

आगे क्या होगा?

नेपाल में राजतंत्र और प्रजातंत्र के बीच चल रहा यह संघर्ष राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह संकट नेपाल की आंतरिक राजनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, और इसका प्रभाव देश के भविष्य पर भी पड़ सकता है। दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच टकराव बढ़ने की संभावना है, और काठमांडू में स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो सकती है।

अगर यह आंदोलन तेज हुआ तो नेपाल में आने वाले समय में एक नई राजनीतिक दिशा देखने को मिल सकती है। वहीं, प्रजातंत्र समर्थकों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर लोकतंत्र की रक्षा करेंगे। यह देखना होगा कि नेपाल का यह आंतरिक संकट कैसे सुलझता है और क्या राजतंत्र की वापसी संभव हो पाएगी।

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